मेरी मधुशाला
राह पकड़ कर एक चला था
पाने को मैं मधुशाला
राह नयी थी चाह नयी थी
था चारो औ अँधियारा
ना समझ थी न अकल थी
था निर्मल भोला भाला
पथ पर मुझको चलते चलते
भोरे मिली एक मधुशाला
देख अचंभित हो प्रफुल्ल्ति
कांप उठी मेरी काया
पग आगे लूँ या मूड़ जाऊँ
सोच रहा था वो प्यारा
डरते डरते पग उठाके
उसकी चौखठ को लांगा
ना होली थी ना ही दिवाली
था मैं अकेला पीनेवाला
झिझक झिझक कर रुक रुक कर
फिर मैंने साकी से माँगा
पर माँगा भी तो क्या माँगा
माँगा जल का एक प्याला
अब बैठा असमंजस में मैं
देख रहा अपना प्याला
क्यों माँगा जल मैंने
जब पीनी मुझको थी हाला
अब शर्मा कर के हूँ बैठा
सोच रहा क्या कर डाला
अब कैसे मांगू मैं अमृत
क्या सोचेगी मधुशाला
इतने में डगमग करता
आया एक पीनेवाला
होश नहीं था खबर नहीं थी
क्या शाळा से उसने माँगा
एक घूँट में उसने पी कर
प्याले को थल पे मारा
छोड़ दिया उसने वो आँगन
तोड़ दिया उसने प्याला
देख मिट्टी को मिट्टी होता
शोक मनाती मधुशाला
व्याकुलता से मैंने देखा
जल उठी मन की ज्वाला
पर समझाया मैंने खुद को
कौन हूँ मैं कुछ कहने वाला
ना प्याला ना साकी मेरा
ना ही मेरी मधुशाला
मधुशाला सबको अपनाती
पंडित मोमिन सरदारा
देते देते सबको अमृत
खुद को भूली मधुशाला
हर पीनेवाला ने केवल
अपने प्याले को देखा
न देखा शाळा के मन को
ना देखी उसकी आशा
ना जानी उसकी चंचलता
ना चाही उसकी ममता
ना उसके मन को टटोला
ना पुछा दिल का हाला
ना शाळा को मंदिर माना
ना मस्जिद ना गुरुद्वारा
ना पत्थर सी पूजा की
ना सज्दे में याद किया
मधुशाला भी आस लगाती
आये ऐसा इक पीनेवाला
जो शाळा को अपनाये
और अपनाये अग्नि ज्वाला
भारी कदमो से मैंने फिर
उसके आँगन को छोड़ा
चलते चलते मन में ठानी
जब में वापस लौटूंगा
हर इक प्याला मेरा होगा
मेरी होगी मधुशाला
पाने को मैं मधुशाला
राह नयी थी चाह नयी थी
था चारो औ अँधियारा
ना समझ थी न अकल थी
था निर्मल भोला भाला
पथ पर मुझको चलते चलते
भोरे मिली एक मधुशाला
देख अचंभित हो प्रफुल्ल्ति
कांप उठी मेरी काया
पग आगे लूँ या मूड़ जाऊँ
सोच रहा था वो प्यारा
डरते डरते पग उठाके
उसकी चौखठ को लांगा
ना होली थी ना ही दिवाली
था मैं अकेला पीनेवाला
झिझक झिझक कर रुक रुक कर
फिर मैंने साकी से माँगा
पर माँगा भी तो क्या माँगा
माँगा जल का एक प्याला
अब बैठा असमंजस में मैं
देख रहा अपना प्याला
क्यों माँगा जल मैंने
जब पीनी मुझको थी हाला
अब शर्मा कर के हूँ बैठा
सोच रहा क्या कर डाला
अब कैसे मांगू मैं अमृत
क्या सोचेगी मधुशाला
इतने में डगमग करता
आया एक पीनेवाला
होश नहीं था खबर नहीं थी
क्या शाळा से उसने माँगा
एक घूँट में उसने पी कर
प्याले को थल पे मारा
छोड़ दिया उसने वो आँगन
तोड़ दिया उसने प्याला
देख मिट्टी को मिट्टी होता
शोक मनाती मधुशाला
व्याकुलता से मैंने देखा
जल उठी मन की ज्वाला
पर समझाया मैंने खुद को
कौन हूँ मैं कुछ कहने वाला
ना प्याला ना साकी मेरा
ना ही मेरी मधुशाला
मधुशाला सबको अपनाती
पंडित मोमिन सरदारा
देते देते सबको अमृत
खुद को भूली मधुशाला
हर पीनेवाला ने केवल
अपने प्याले को देखा
न देखा शाळा के मन को
ना देखी उसकी आशा
ना जानी उसकी चंचलता
ना चाही उसकी ममता
ना उसके मन को टटोला
ना पुछा दिल का हाला
ना शाळा को मंदिर माना
ना मस्जिद ना गुरुद्वारा
ना पत्थर सी पूजा की
ना सज्दे में याद किया
मधुशाला भी आस लगाती
आये ऐसा इक पीनेवाला
जो शाळा को अपनाये
और अपनाये अग्नि ज्वाला
भारी कदमो से मैंने फिर
उसके आँगन को छोड़ा
चलते चलते मन में ठानी
जब में वापस लौटूंगा
हर इक प्याला मेरा होगा
मेरी होगी मधुशाला
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