कौन हूँ मैं

है द्वन्द  मेरा मुझसे ही
हूँ तंग खड़ा खुदसे ही
हर वार मेरा मुझपे ही
हर हार मेरी मुझसे ही

हो संतुष्ट मैं मोक्ष को पाऊँ
या भर उड़ान तारे गिन आऊं
कल कल कर के बहता जाऊं
या हुंकार की गूँज लगाऊँ

मुस्कुरा के सदा सबको अपनाऊं
या उठा आवाज़ परिवर्तन लाऊँ
बन अशोक मैं शोक मनाऊँ
या जीत जगत, सिकंदर कह लाऊँ

जल सूरज सा जग चमकाऊँ
या चाँद सी शीतलता बिखराऊँ
बन कृष्ण शब्द जाल बिछाऊँ
या मर्यादा पुरुषोत्तम कह लाऊँ

हर तर्क मेरा मुझे ही
हर प्रश्न मेरा मुझसे ही
है व्यंग्य मेरा मुझपे ही
है द्वन्द मेरा मुझसे से



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